आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

21 जून 2017

Shri Radha Ki Parampriya Ashtsakhiyan

श्रीराधा की परमप्रिय अष्टसखियां

अष्टसखी करतीं सदा सेवा परम अनन्य,
श्रीराधामाधव युगल की कर निज जीवन धन्य।
जिनके चरण सरोज में बारम्बार प्रणाम,
करुणा कर दें युगल पद-रज-रति अभिराम।। (पद-रत्नाकर)


श्रीराधाजी की पांच प्रकार की सखियां मानी जाती हैं–सखी, नित्यसखी, प्राणसखी, प्रियसखी और परमप्रेष्ठसखी (सबसे अधिक प्रिय सखी)। ललिता, विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा, चम्पकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या और सुदेवी–ये श्रीराधाजी की परमप्रेष्ठसखी हैं। ये आठों सखियां ही ‘अष्टसखी’ के नाम से जानी जाती हैं। श्रीराधामाधव की लीला में इनकी आयु चौदह वर्ष की है। इनकी देह श्रीराधा की तरह नित्य सुन्दर, नित्य मधुर व सच्चिदानन्दमय हैं। श्रीराधाकृष्ण की लीला में ये आठ सखियां सदैव विद्यमान रहती हैं। ये सखियां राधामाधव की सेवा में लगे रहकर ही परमानन्द का अनुभव करती हैं।

जिस प्रकार मानवशरीर में हृदय से जुड़ी धमनियां शुद्ध रक्त लेकर सम्पूर्ण शरीर में फैलाती हैं, उसी प्रकार ये अष्टसखियां श्रीराधा के हृदयसरोवर से प्रेमरस लेकर सर्वत्र प्रेम का विस्तार करती हैं।श्रीराधामाधव को सुख पहुंचाना ही इनके जीवन का आधार है।

निकुंजलीला की संयोजिका हैं अष्टसखियां

निकुंजलीला में श्रीराधामाधव के मधुरमिलन का आयोजन करने वाली अष्टसखियां ही हैं। इनके वाद्यों में वही गीत बजता है, जो युगलस्वरूप श्रीराधाकृष्ण के हृदयतन्त्र में ध्वनित होता है और श्रीराधामाधव के हृदय में गूंजने वाले राग के स्वर ही इनके वाद्यों से निकलते हैं अर्थात् निकुंजलीला में ये अष्टसखियां श्रीराधामाधव की इच्छाशक्ति हैं।

‘अष्टसखियों को श्रीराधा की अपने प्रिय श्रीकृष्ण की सेवा के लिए प्रकट होने वाली अगणित इच्छाओं का स्वरूप भी कहा जा सकता है।’

श्रीराधा की अष्टसखियों का परिचय

श्रीललिता


ललिता सखी श्रीराधा की सबसे प्रिय सखी हैं। ललिता सखी के श्रीअंगों की कांति गोरोचन (पीतवर्ण का सुगन्धित द्रव्य) के समान है। वे मोरपंख के समान चित्रित साड़ी पहनती हैं। वे सभी सखियों की गुरुरूपा हैं। श्रीललिता इन्द्रजाल में निपुण हैं। फूलों की कला में कुशल वे श्रीराधामाधव की कुंजलीला के लिए फूलों के सुन्दर चंदोबे तैयार करती हैं। ये श्रीराधा को ताम्बूल (पान का बीड़ा) देने की सेवा करती हैं। इस सेवा से वे अत्यन्त ललित (सुन्दर) हो गयीं हैं।

इन्द्रजाल-निपुणा, नित करती
परम स्वादु ताम्बूल प्रदान।
कुसुम-कला-कुशला, रचती कल
कुसुम-निकेतन कुसुम-वितान।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

विशाखा

विशाखा सखी के अंगों की कान्ति सौदामिनी (आकाशीय बिजली) की तरह है। उनकी साड़ी ऐसे झिलमिल करती है मानो आकाश से समस्त तारागण आकर उसमें सिमट गए हों। वे श्रीराधा को कर्पूर-चन्दनयुक्त सुगन्धित अंगराग लगाती हैं व उनके श्रीअंग में सुन्दर पत्रावली (बेल-बूटे) बनाती हैं।

कर्पूरादि सुगन्ध-द्रव्य युत
लेपन करती सुन्दर अंग।
बूटे-बेल बनाती, रचती
चित्र विविध रुचि अंग-प्रत्यंग।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

चित्रा

चित्रासखी के श्रीअंगों की कान्ति केशर के समान हैं। ये काचवर्ण की सुन्दर साड़ी धारण करती हैं। हृदय में सुन्दर भावों को लिए ये करुणा से भरी हैं। ये श्रीराधा का वस्त्र-आभूषण से सुन्दर श्रृंगार करने की सेवा करती हैं। चित्रा सखी अनेक प्रकार की सांकेतिक भाषाओं को जानती हैं।

विविध विचित्र वसन-आभूषण
से करती सुन्दर श्रृंगार।
करती सांकेतिक अनेक
देशों की भाषा का व्यवहार।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

इन्दुलेखा

श्रीराधा की इन्दुलेखा सखी के शरीर की शोभा हरिताल (पीले रंग) जैसी है। ये दाड़िमपुष्पों के (लाल) रंग की सुन्दर साड़ी धारण करती हैं। इनके मुख पर प्रसन्नता की शोभा चन्द्रमा से भी बढ़कर है। ये अपने नृत्य द्वारा श्रीराधामाधव को प्रसन्न करती हैं। ये व्रज की सबसे प्रसिद्ध गायन-विद्या में निपुण गोपी हैं।

करती नृत्य विचित्र भंगिमा
संयुत नित नूतन अभिराम।
गायन-विद्या-निपुणा, व्रज की
ख्यात गोपसुन्दरी ललाम।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

चम्पकलता

श्रीराधा की चम्पकलता सखी के अंगों की आभा चम्पकपुष्प जैसी (श्वेत) है। ये नीलवर्ण की साड़ी पहनती हैं। ये अपने करकमलों से रत्ननिर्मित चँवर डुलाकर निरन्तर श्रीराधा की सेवा करती हैं। द्यूतविद्या की पंडित हैं और तरह-तरह से सुन्दर श्रृंगार करने में निपुण हैं।

चाव भरे नित चँवर डुलाती
अविरत निज कर-कमल उदार।
द्यूत-पण्डिता, विविध कलाओं
से करती सुन्दर श्रृंगार।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

रंगदेवी

इनके अंगों की कान्ति पद्मपराग (कमल-केसर) के समान है और ये जवाकुसुम रंग की साड़ी धारण करती हैं। ये नित्य श्रीराधा के हाथों और चरणों में अत्यन्त सुन्दर जावक (महावर) लगाती हैं। व्रतों व त्यौहारों में आस्था रखने वाली अत्यन्त सुन्दर रंगदेवी सखी सभी कलाओं में निपुण हैं।

नित्य लगाती रुचि कर-चरणों
में यावक अतिशय अभिराम।
आस्था अति त्यौहार-व्रतों में
कला-कुशल शुचि शोभाधाम।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

तुंगविद्या

श्रीराधा की सखी तुंगविद्या की कान्ति कर्पूर-चंदन मिश्रित कुंकुम के समान है। वे पीले रंग की सुन्दर साड़ी धारण करती हैं और अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जानी जाती हैं। इन्हें नीति-नाटक आदि सभी विद्याओं का ज्ञाता बताया गया है। तुंगविद्या सखी का कार्य श्रीराधाकृष्ण को गीत, वाद्य आदि से प्रसन्न करना है।

गीत-वाद्य से सेवा करती
अतिशय सरस सदा अविराम।
नीति-नाट्य-गान्धर्व-शास्त्र
निपुणा रस-आचार्या अभिराम।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

सुदेवी

सुदेवी सखी की अंगकान्ति तपाये हुए सोने के समान है। वे मूंगे के रंग की साड़ी धारण करती हैं और श्रीराधा की सुन्दर वेणी बनाने की कला में निपुण हैं और श्रीराधा को जल पिलाने की सेवा करती हैं।

जल निर्मल पावन सुरभित से
करती जो सेवा अभिराम।
ललित लाड़िली की जो करती
बेणी-रचना परम ललाम।। (महाभाव-कल्लोलिनी)

भगवान श्रीराधामाधव के प्रेमधाम में ये अष्टसखियां युगलस्वरूप की सेवा में नित्य नियुक्त रहती हैं।

अष्टसखियों के गांव

श्रीराधाजी की आठ खास सखियों के नाम से बरसाना क्षेत्र में आठ गांव बसे हैं–

ललिता सखी–ऊंचा गांव, अटोर पर्वत।
विशाखा सखी–आजनौंक गांव (कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि सुनकर आतुर हुई श्रीराधा यहां एक ही नेत्र में अंजन (काजल) लगाकर चली आईं। तब श्रीकृष्ण ने एक काली शिला पर अंगूठी रगड़कर किशोरीजी की दूसरी आंख में स्वयं अंजन लगाया था। इसी से इसका नाम आजनौंक पड़ गया।)
चित्रलेखा सखी–चिकसोली गांव, ब्रह्मांचल पर्वत।
तुंगविद्या सखी–कमई गांव।
रंगदेवी सखी–डभारो गांव, रत्नागिरी पर्वत (डभारो का अर्थ है ‘डबडबाई आंखें’ या ‘अश्रुपूरित नेत्र’। कहते हैं अत्यधिक प्रेम के कारण श्रीराधा के विछोह में यहां भगवान श्रीकृष्ण के नेत्र भर आए थे।)
इन्दुलेखा सखी–राकौली गांव।
चंपकलता सखी–करहला गांव, अष्टकूट पर्वत।
सुदेवी सखी–सुनहरा गांव, अरावली पर्वत।

02 जून 2017

Mangal Bhavan Amangal Hari

मंगल भवन अमंगल हारी

मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम - 2


हो, होइहै वही जो राम रचि राखा
को करे तरफ़ बढ़ाए साखा
राम सिया राम सिया राम जय जय राम - 2

हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी
आपद काल परखिये चारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम - 2

हो, जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू
राम सिया राम सिया राम जय जय राम - 2

हो, जाकी रही भावना जैसी
रघु मूरति देखी तिन तैसी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम - 2

रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई
राम सिया राम सिया राम जय जय राम - 2

हो, हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता
राम सिया राम सिया राम जय जय राम - 2

http://www.geetganga.org/files/audio/Mangal%20Bhavan.mp3

magala bhavana amaṁgala hārī
dravahu sudasaratha acara bihārī
rāma siyā rāma siyā rāma jaya jaya rāma - 2
ho hoihai vahī jo rāma raci rākhā
ko kare tarafa baṛhāe sākhā

ho dhīraja dharama mitra aru nārī
āpada kāla parakhiye cārī

ho jehike jehi para satya sanehū
so tehi milaya na kachu sandehū

ho jākī rahī bhāvanā jaisī
raghu mūrati dekhī tina taisī

raghukula rīta sadā calī āī
prāṇa jāe para vacana na jāī
rāma siyā rāma siyā rāma jaya jaya rāma

ho hari ananta hari kathā anantā
kahahi sunahi bahuvidhi saba saṁtā
rāma siyā rāma siyā rāma jaya jaya rāma
Sri Hanumate Namah
Rajesh Mishra

22 मई 2017

Amarnath Baba ki kahani Raj ki jubani Amarnath Dhaam Sampurn Yatra

अमरनाथ धाम यात्रा
 Amarnath Dhaam Yatra

  • अमरनाथ धाम श्रद्धालुओं के लिए यह अत्यंत पूजनीय है. जिसने भी इस यात्रा के बारे में जाना या सुना है, वह कम से कम एक बार जाने की इच्छा जरूर रखता है.
  • ऐसी मान्‍यता है कि यहां पहुंचता वही है, जिसे बाबा अमरनाथ अपने दरबार में बुलाते हैं.
  • अमरनाथ की अवस्थिति: अमरनाथ धाम श्रीनगर से लगभग 135 किलोमीटर दूर है.
  • यह स्थान समुद्रतल से 13,600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है. इस स्थान पर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है.
  • जरूरी है पंजीकरण: प्रतिवर्ष अमरनाथ यात्रा के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. यात्रा से पूर्व श्रद्धालुओं को पंजीकरण करवाना होता है.
  • पंजीकरण के लिए भक्तों से कुछ शुल्क जमा करना पड़ता है.
  • सरकार एवं कुछ निजी संस्थाओं द्वारा यात्रियों को यात्रा सुविधाएं दी जाती हैं.
  • कैसे पहुंचें: हवाई मार्गअमरनाथ दर्शन करने के लिए निकटतम हवाई अड्डा श्रीनगर में है.
  • पर्यटक श्रीनगर आकर प्रसिद्ध डल झील, मुगल गार्डन आदि देखना नहीं भूलते हैं.
  • श्रीनगर जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य की ग्रीष्‍मकालीन राजधानी भी है.
  • श्रीनगर भलीभांति हवाई मार्ग और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है.
  • रेलमार्ग: निकटतम रेलवे स्‍टेशन जम्‍मू है. जम्‍मू प्रदेश की शीतकालीन राजधानी है.
  • जम्‍मू रेलवे स्‍टेशन देश के अन्‍य शहरों से पूरी तरह जुड़ा हुआ है.
  • सड़क मार्ग: जम्‍मू और श्रीनगर सड़क मार्ग से जुड़े हुए हैं. यहां बस और टैक्‍सी सेवा आसानी से उपलब्‍ध है.
  • अमरनाथ जाने के दो मार्ग: अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए दो रास्ते हैं, एक पहलगांव होकर तथा दूसरा बालटाल होकर.
  • इन स्थानों तक दर्शनार्थी बस से आते हैं, इसके बाद का सफर पैदल तय करना होता है.
  • पहलगांव से होकर जाने वाला रास्ता बालटाल की तुलना में सुगम है.
  • यही वजह है कि सुरक्षा की दृष्टि से तीर्थ यात्री इसी रास्ते से अमरनाथ जाना अधिक पसंद करते हैं.
  • हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक: भगवान अपने भक्तों में किसी प्रकार का अंतर नहीं करते हैं, इसका प्रमाण है अमरनाथ धाम.
  • हिन्दू जिस अमरनाथ धाम की यात्रा को अपना सौभाग्य मानते हैं, उस धाम के बारे में बताने वाला एक मुस्लिम गड़रिया था.
  • आज भी मंदिर में चढ़ावे का एक चौथाई भाग इस मुस्लिम गड़रिये परिवार को मिलता है.
  • अमरनाथ धाम का महात्म्य: कहते हैं कि जिस पर भोले बाबा की कृपा होती है, वही अमरनाथ धाम पहुंचता है.
  • अमरनाथ यात्रा पर पहुंचना ही सबसे बड़ा पुण्य है.
  • जो भक्त बाबा हिमानी का दर्शन करता है, उसे इस संसार में हर तरह के सुख की प्राप्ति होती है.
  • कहा जाता है कि इससे व्यक्ति के कई जन्मों के पाप कट जाते हैं और शरीर त्याग करने के बाद वह उत्तम लोक में जगह पाता है.
  • बालताल से श्रद्धालु पहलगाम पड़ाव तक जाएंगे.
  • पहलगाम के बाद चंदनवाड़ी दूसरा पड़ाव होगा.
  • चंदनवाड़ी के बाद शेषनाग तीसरा पड़ाव होगा.
  • चंदनवाड़ी के बाद श्रद्धालु पंचतरनी पहुंचेंगे.
  • और अंतिम में श्रद्धालु बाबा के गुफा तक पहुचेंगे.
  • अमरनाथ हिन्दुओ का एक प्रमुख तीर्थस्थल है. यह जम्मू कश्मीर राज्य में है.
  • मंगलवार से अमरनाथ यात्रा की शुरुआत हुई है.
  • अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. इसे तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्योंकि यहीं भगवान शिव ने मां पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था.
  • श्री अमरनाथ की विशेषता यह है कि यहां की पवित्र गुफा में बर्फ का स्वयंभू शिवलिंग निर्मित होता है.
  • हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं.
  • अमरनाथ यात्रा जाने के लिए यात्रियों को पहले पंजीकरण कराना होता है.
  • सभी श्रद्धालु जम्मू में एकत्रित होते हैं.
  • जम्मू से यात्रियों को एक समूह में अमरनाथ यात्रा पर रवाना किया जाता है. रास्ते में इनकी सुविधाओं का विशेष ख्याल भी रखा जाता है.

श्री अमरनाथ के कुछ ऐसे रहस्य जो नहीं जानते होंगे आप

असंख्य शिव भक्तों की आस्था के साथ जुड़ी पावन श्री अमरनाथ यात्रा आधिकारिक रूप से आज 2 जुलाई 2016 से प्रारंभ होने जा रही है।धरती का स्वर्ग कही जाने वाली कश्मीर घाटी में स्थित श्री अमरनाथ स्वामी की पवित्र गुफा में प्रतिवर्ष बर्फ से बनने वाले प्राकृतिक हिमशिवलिंग की पूजा की जाती है। श्री अमरनाथ धाम में देवाधिदेव महादेव को साक्षात विराजमान माना जाता है। महादेव प्रति वर्ष श्री अमरनाथ गुफा में अपने भक्तों को हिमशिवलिंग के रूप में दर्शन देते हैं। इस पवित्र गुफा में हिमशिवलिंग के साथ ही एक गणेश पीठ, एक पार्वती पीठ भी हिम से प्राकृतिक रूप में निर्मित होती है। पार्वती पीठ ही शक्तिपीठ स्थल है।
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को बाबा बर्फानी अमरनाथ स्वामी के दर्शन के साथ-साथ माता पार्वती शक्तिपीठ का भी दर्शन होता है। यहां माता सती के अंग तथा अंगभूषण की पूजा होती है क्योंकि यहां उनके कंठ का निपात हुआ था।
श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा में भगवान शंकर ने शिव धाम की प्राप्ति करवाने वाली परम पवित्र ‘अमर कथा’ भगवती पार्वती को सुनाई थी। जब भगवान शंकर यह कथा पार्वती जी को सुना रहे थे तो वहां एक तोते का बच्चा भी इसे सुन रहा था और इसे सुन कर फिर उस तोते के बच्चे ने श्री शुकदेव स्वरूप पाया था।
‘शुक’ संस्कृत में तोते को कहते हैं और इसी कारण बाद में फिर मुनि ‘शुकदेव’ के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुए। यह कथा भगवती पार्वती तथा भगवान शंकर का संवाद है। लोक व परलोक का सुख देने वाले शंकर भगवान और पार्वती जी के इस संवाद का वर्णन भृगु संहिता, नीलमत पुराण, तीर्थ संग्रह आदि ग्रंथों में पाया जाता है।

श्री अमरनाथ गुफा की खोज से जुड़े रहस्य

इस पवित्र गुफा की खोज बहुत ही नेक और दयालु मुसलमान गडरिए बूटा मलिक ने की थी। वह एक दिन अपनी भेड़ों को चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंच कर उसकी एक साधु से भेंट हो गई। साधु ने उसे कोयले से भरी एक कांगड़ी दी। घर पहुंच कर बूटा मलिक ने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधु का धन्यवाद करने के लिए लौटा परंतु वहां साधु की बजाय एक विशाल गुफा देखी। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया। आज भी यात्रा पर आने वाले शिव भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे का एक निश्चित हिस्सा मलिक परिवार के वंशजों को जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार कश्यप ऋषि ने कश्मीर घाटी के पानी का निष्कासन किया। कश्मीर घाटी उस समय एक बहुत बड़ी झील मानी जाती थी। जब लोगों को इसका ज्ञान हुआ तो वे इस शिव स्थल की तीर्थ यात्रा पर आने लगे। कश्यप ऋषि द्वारा अस्तित्व में आने के कारण से ही इस घाटी का नाम कच्छप घाटी पड़ा जो बाद में कश्मीर घाटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

गुफा से जुड़े रहस्य

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के स्थान पर दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार के लिए गए हुए थे और भगवती पार्वती यहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि को आसन देकर कहा, ‘‘देवर्षि! कृपा अपने आने का कारण कहिए।’’
देवर्षि बोले, ‘‘देवी! भगवान शंकर के गले में मुंड माला क्यों है?’’
भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। उन्होंने कहा, ‘‘जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।’’
पार्वती जी बोलीं, ‘‘मेरा शरीर नाशवान है, परंतु आप अमर हैं इसका कारण बताएं।’’
भगवान शंकर ने कहा यह सब अमरकथा के कारण है। यह उत्तर सुनकर माता पार्वती के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान शंकर से शिव कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं। शिव शंकर ने बहुत वर्षों तक इसे टालने का प्रयत्न किया, परंतु पार्वती जी के हठ के कारण उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए भगवान शंकर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि) का परित्याग करके इन पर्वतमालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। फिर चंदनबाड़ी में भगवान शिव ने अपनी जटाओं (केशों) से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने अपने गले से सर्पों को भी उतार दिया। श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुनस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी पहुंच कर शिव जी ने पांचों तत्वों का परित्याग किया। सब कुछ छोड़-अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अपने श्रीमुख से अमरकथा सुनाई।

हिम शिवलिंग

प्रतिकूल मौसम के बावजूद बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए प्रति वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक दंत कथा के अनुसार रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं। ऐसी मान्यता है कि चातुर्मास की प्रतिपदा को हिम के लिंग का निर्माण स्वयं आरंभ होता है और धीरे-धीरे लिंग का आकार धारण कर लेता है तथा पूर्णिमा के दिन पूर्ण हो जाता है व अगले दिन से घटने लगता है। अमावस्या या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को यह लिंग पूर्णत: अदृश्य हो जाता है और इस प्रकार यह क्रम निरंतर चलता रहता है। यह हिम शिवलिंग कभी भी पूर्णत: लुप्त नहीं होता, आकार अवश्य ही छोटा-बड़ा हो जाता है। भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने ‘हिमशिवलिंग’ के पास स्थापित कर दी जाती है।

अमरेश महादेव

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग से जुड़ी इस कथा को सुनाने के लिए माता पार्वती जी भगवान सदाशिव से कहती हैं, ‘‘प्रभो! मैं अमरेश महादेव की कथा सुनना चाहती हूं। मैं यह भी जानना चाहती हूं कि महादेव गुफा में स्थित होकर अमरेश क्यों और कैसे कहलाए?’’
सदाशिव भोलेनाथ माता पार्वती का प्रश्र सुनकर कहने लगे आदिकाल में ब्रह्मा, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, कूष्मांड, भैरव, गीदड़, दानव आदि की उत्पत्ति हुई। इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टि हुई परंतु इंद्र आदि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में थे।
देवता, भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति की और कहा हमें मृत्यु बाधा करती है। आप कोई ऐसा उपाय बतलाएं जिससे मृत्यु हम लोगों को बाधा न करे। देवताओं की बात सुनकर भोलेनाथ स्वामी बोले मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। यह कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्यु रोग की औषधि है।
उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली और वह धारा बाद में अमरावती नदी के नाम से विख्यात हुई। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर पर जो अमृत बिंदु गिरे वे सूख कर पृथ्वी पर गिर पड़े। पावन गुफा में जो भस्म है वह इसी अमृत बिंदु के कण हैं।
कहते हैं सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए। देवगण सदाशिव को जल स्वरूप देख कर उनकी स्तुति में लीन हो गए और बारम्बार नमस्कार करने लगे। भोलेनाथ ने दयायुक्त वाणी से देवताओं से कहा, तुमने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा। अब तुम यहीं पर अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाओ। आज से मेरा यह अनादिलिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा।
भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने अमृत रूप सोमकला को धारण करके देवताओं की मृत्यु का नाश किया इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।


24 मार्च 2017

स्वप्न फल : स्वप्नों का अर्थ : राजेश #मिश्रा

क्या आप जानते हैं कौन-से स्वप्न देते हैं शुभ फल
जानिए स्वप्न और शुभ फल का संबंध

स्वप्न ज्योतिष के अनुसार नींद में दिखाई देने वाले हर सपने का एक ख़ास संकेत होता है, एक ख़ास फल होता है। प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान और उनके फलों पर विस्तार से व्याख्या की गई है। रात्रि को नींद में दिखाई देने वाले कुछ स्वप्न हमें शुभ फल देते हैं तो कुछ अशुभ। हम आपके लिए लेकर आए हैं,...
यहाँ हम आपको 251 सपनो के स्वपन ज्योतिष के अनुसार संभावित फल बता रहे है।
सपने फल :
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
1- आंखों में काजल लगाना- शारीरिक कष्ट होना
2- स्वयं के कटे हाथ देखना- किसी निकट परिजन की मृत्यु
3- सूखा हुआ बगीचा देखना- कष्टों की प्राप्ति
4- मोटा बैल देखना- अनाज सस्ता होगा
5- पतला बैल देखना – अनाज महंगा होगा
6- भेडिय़ा देखना- दुश्मन से भय
7- राजनेता की मृत्यु देखना- देश में समस्या होना
8- पहाड़ हिलते हुए देखना- किसी बीमारी का प्रकोप होना
9- पूरी खाना- प्रसन्नता का समाचार मिलना
10- तांबा देखना- गुप्त रहस्य पता लगना
11- पलंग पर सोना- गौरव की प्राप्ति
12- थूक देखना- परेशानी में पडऩा
13- हरा-भरा जंगल देखना- प्रसन्नता मिलेगी
14- स्वयं को उड़ते हुए देखना- किसी मुसीबत से छुटकारा
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
Rajesh Mishra Tour Sundarvan

15- छोटा जूता पहनना- किसी स्त्री से झगड़ा
16- स्त्री से मैथुन करना- धन की प्राप्ति
17- किसी से लड़ाई करना- प्रसन्नता प्राप्त होना
18- लड़ाई में मारे जाना- राज प्राप्ति के योग
19- चंद्रमा को टूटते हुए देखना- कोई समस्या आना
20- चंद्रग्रहण देखना- रोग होना
21- चींटी देखना- किसी समस्या में पढऩा
22- चक्की देखना- शत्रुओं से हानि
23- दांत टूटते हुए देखना- समस्याओं में वृद्धि
24- खुला दरवाजा देखना- किसी व्यक्ति से मित्रता होगी
25- बंद दरवाजा देखना- धन की हानि होना
26- खाई देखना- धन और प्रसिद्धि की प्राप्ति
27- धुआं देखना- व्यापार में हानि
28- भूकंप देखना- संतान को कष्ट
29- सुराही देखना- बुरी संगति से हानि
30- चश्मा लगाना- ज्ञान बढऩा
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
31- दीपक जलाना- नए अवसरों की प्राप्ति
32- आसमान में बिजली देखना- कार्य-व्यवसाय में स्थिरता
33- मांस देखना- आकस्मिक धन लाभ
34- विदाई समारोह देखना- धन-संपदा में वृद्धि
35- टूटा हुआ छप्पर देखना- गड़े धन की प्राप्ति के योग
36- पूजा-पाठ करते देखना- समस्याओं का अंत
37- शिशु को चलते देखना- रुके हुए धन की प्राप्ति
38- फल की गुठली देखना- शीघ्र धन लाभ के योग
39- दस्ताने दिखाई देना- अचानक धन लाभ
40- शेरों का जोड़ा देखना- दांपत्य जीवन में अनुकूलता
41- मैना देखना- उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति
42- सफेद कबूतर देखना- शत्रु से मित्रता होना
43- बिल्लियों को लड़ते देखना- मित्र से झगड़ा
44- सफेद बिल्ली देखना- धन की हानि
45- मधुमक्खी देखना- मित्रों से प्रेम बढऩा
46- खच्चर दिखाई देना- धन संबंधी समस्या
47- रोता हुआ सियार देखना- दुर्घटना की आशंका
48- समाधि देखना- सौभाग्य की प्राप्ति
49- गोबर दिखाई देना- पशुओं के व्यापार में लाभ
50- चूड़ी दिखाई देना- सौभाग्य में वृद्धि
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
Rajesh Mishra, Singar Ganesh, Sanjay Agrawal, Prasun Paul
and Dilip Agrawal tour Khatudham Shyam Mandir


51- दियासलाई जलाना- धन की प्राप्ति
52- सीना या आंख खुजाना- धन लाभ
53- सूखा जंगल देखना- परेशानी होना
54- मुर्दा देखना- बीमारी दूर होना
55- आभूषण देखना- कोई कार्य पूर्ण होना
56- जामुन खाना- कोई समस्या दूर होना
57- जुआ खेलना- व्यापार में लाभ
58- धन उधार देना- अत्यधिक धन की प्राप्ति
59- चंद्रमा देखना- सम्मान मिलना
60- चील देखना- शत्रुओं से हानि
61- स्वयं को दिवालिया घोषित करना- व्यवसाय चौपट होना
62- चिडिय़ा को रोते देखता- धन-संपत्ति नष्ट होना
63- चावल देखना- किसी से शत्रुता समाप्त होना
64- चांदी देखना- धन लाभ होना
65- दलदल देखना- चिंताएं बढऩा
66- कैंची देखना- घर में कलह होना
67- सुपारी देखना- रोग से मुक्ति
68- लाठी देखना- यश बढऩा
69- खाली बैलगाड़ी देखना- नुकसान होना
70- खेत में पके गेहूं देखना- धन लाभ होना
71- फल-फूल खाना- धन लाभ होना
72- सोना मिलना- धन हानि होना
73- शरीर का कोई अंग कटा हुआ देखना- किसी परिजन की मृत्यु के योग
74- कौआ देखना- किसी की मृत्यु का समाचार मिलना
75- धुआं देखना- व्यापार में हानि
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
Rajesh Mishra, Har ki Paudi- Haridwar

76- चश्मा लगाना- ज्ञान में बढ़ोत्तरी
77- भूकंप देखना- संतान को कष्ट
78- रोटी खाना- धन लाभ और राजयोग
79- पेड़ से गिरता हुआ देखना- किसी रोग से मृत्यु होना
80- श्मशान में शराब पीना- शीघ्र मृत्यु होना
81- रुई देखना- निरोग होने के योग
82- कुत्ता देखना- पुराने मित्र से मिलन
83- सफेद फूल देखना- किसी समस्या से छुटकारा
84- उल्लू देखना- धन हानि होना
85- सफेद सांप काटना- धन प्राप्ति
86- लाल फूल देखना- भाग्य चमकना
87- नदी का पानी पीना- सरकार से लाभ
88- धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना- यश में वृद्धि व पदोन्नति
89- कोयला देखना- व्यर्थ विवाद में फंसना
90- जमीन पर बिस्तर लगाना- दीर्घायु और सुख में वृद्धि
91- घर बनाना- प्रसिद्धि मिलना
92- घोड़ा देखना- संकट दूर होना
93- घास का मैदान देखना- धन लाभ के योग
94- दीवार में कील ठोकना- किसी बुजुर्ग व्यक्ति से लाभ
95- दीवार देखना- सम्मान बढऩा
96- बाजार देखना- दरिद्रता दूर होना
97- मृत व्यक्ति को पुकारना- विपत्ति एवं दु:ख मिलना
98- मृत व्यक्ति से बात करना- मनचाही इच्छा पूरी होना
99- मोती देखना- पुत्री प्राप्ति
100- लोमड़ी देखना- किसी घनिष्ट व्यक्ति से धोखा मिलना
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
Rajesh Mishra, Mansa Mata Temple, Haridwar, Uttrakhand

101- अनार देखना- धन प्राप्ति के योग
102- गड़ा धन दिखाना- अचानक धन लाभ
103- सूखा अन्न खाना- परेशानी बढऩा
104- अर्थी देखना- बीमारी से छुटकारा
105- झरना देखना- दु:खों का अंत होना
106- बिजली गिरना- संकट में फंसना
107- चादर देखना- बदनामी के योग
108- जलता हुआ दीया देखना- आयु में वृद्धि
109- धूप देखना- पदोन्नति और धनलाभ
110- रत्न देखना- व्यय एवं दु:ख
111- चेक लिखकर देना- विरासत में धन मिलना
112- कुएं में पानी देखना- धन लाभ
113- आकाश देखना – पुत्र प्राप्ति
114- अस्त्र-शस्त्र देखना- मुकद्में में हार
115- इंद्रधनुष देखना – उत्तम स्वास्थ्य
116- कब्रिस्तान देखना- समाज में प्रतिष्ठा
117- कमल का फूल देखना- रोग से छुटकारा
118- सुंदर स्त्री देखना- प्रेम में सफलता
119- चूड़ी देखना- सौभाग्य में वृद्धि
120- कुआं देखना- सम्मान बढऩा
121- गुरु दिखाई देना – सफलता मिलना
122- गोबर देखना- पशुओं के व्यापार में लाभ
123- देवी के दर्शन करना- रोग से मुक्ति
124- चाबुक दिखाई देना- झगड़ा होना
125- चुनरी दिखाई देना- सौभाग्य की प्राप्ति
126- छुरी दिखना- संकट से मुक्ति
127- बालक दिखाई देना- संतान की वृद्धि
128- बाढ़ देखना- व्यापार में हानि
129- जाल देखना- मुकद्में में हानि
130- जेब काटना- व्यापार में घाटा
131- चंदन देखना- शुभ समाचार मिलना
132- जटाधारी साधु देखना- अच्छे समय की शुरुआत
133- स्वयं की मां को देखना- सम्मान की प्राप्ति
134- फूलमाला दिखाई देना- निंदा होना
135- जुगनू देखना- बुरे समय की शुरुआत
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
Rajesh Mishra with Krishna, Haridwar Tour

136- टिड्डी दल देखना- व्यापार में हानि
137- डाकघर देखना – व्यापार में उन्नति
138- डॉक्टर को देखना- स्वास्थ्य संबंधी समस्या
139- ढोल दिखाई देना- किसी दुर्घटना की आशंका
140- सांप दिखाई देना- धन लाभ
141- तपस्वी दिखाई देना- दान करना
142- तर्पण करते हुए देखना- परिवार में किसी बुुजुर्ग की मृत्यु
143- डाकिया देखना – दूर के रिश्तेदार से मिलना
144- तमाचा मारना- शत्रु पर विजय
145- उत्सव मनाते हुए देखना- शोक होना
146- दवात दिखाई देना- धन आगमन
147- नक्शा देखना- किसी योजना में सफलता
148- नमक देखना- स्वास्थ्य में लाभ
149- कोर्ट-कचहरी देखना- विवाद में पडऩा
150- पगडंडी देखना- समस्याओं का निराकरण
151- त्रिशूल देखना- शत्रुओं से मुक्ति
152- तारामंडल देखना- सौभाग्य की वृद्धि
153- ताश देखना- समस्या में वृद्धि
154- तीर दिखाई देना- लक्ष्य की ओर बढऩा
155- सूखी घास देखना- जीवन में समस्या
156- भगवान शिव को देखना- विपत्तियों का नाश
157- किसी रिश्तेदार को देखना- उत्तम समय की शुरुआत
158- दंपत्ति को देखना- दांपत्य जीवन में अनुकूलता
159- शत्रु देखना- उत्तम धनलाभ
160- दूध देखना- आर्थिक उन्नति
161- मंदिर देखना- धार्मिक कार्य में सहयोग करना
162- नदी देखना- सौभाग्य वृद्धि
163- नाच-गाना देखना- अशुभ समाचार मिलने के योग
164- नीलगाय देखना- भौतिक सुखों की प्राप्ति
165- नेवला देखना- शत्रुभय से मुक्ति
166- पगड़ी देखना- मान-सम्मान में वृद्धि
167- पूजा होते हुए देखना- किसी योजना का लाभ मिलना
168- फकीर को देखना- अत्यधिक शुभ फल
169- गाय का बछड़ा देखना- कोई अच्छी घटना होना
170- वसंत ऋतु देखना- सौभाग्य में वृद्धि
171- बिल्वपत्र देखना- धन-धान्य में वृद्धि
172- स्वयं की बहन देखना- परिजनों में प्रेम बढऩा
173- भाई को देखना- नए मित्र बनना
174- भीख मांगना- धन हानि होना
175- शहद देखना- जीवन में अनुकूलता
176- स्वयं की मृत्यु देखना- भयंकर रोग से मुक्ति
177- रुद्राक्ष देखना- शुभ समाचार मिलना
178- पैसा दिखाई देना- धन लाभ
179- स्वर्ग देखना- भौतिक सुखों में वृद्धि
180- पत्नी को देखना- दांपत्य में प्रेम बढऩा
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा
Rajesh Mishra in Haridwar Programme

181- स्वस्तिक दिखाई देना- धन लाभ होना
182- हथकड़ी दिखाई देना- भविष्य में भारी संकट
183- मां सरस्वती के दर्शन- बुद्धि में वृद्धि
184- कबूतर दिखाई देना- रोग से छुटकारा
185- कोयल देखना- उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति
186- अजगर दिखाई देना- व्यापार में हानि
187- कौआ दिखाई देना- बुरी सूचना मिलना
188- छिपकली दिखाई देना- घर में चोरी होना
189- चिडिय़ा दिखाई देना- नौकरी में पदोन्नति
190- तोता दिखाई देना- सौभाग्य में वृद्धि
191- भोजन की थाली देखना- धनहानि के योग
192- इलाइची देखना – मान-सम्मान की प्राप्ति
193- खाली थाली देखना- धन प्राप्ति के योग
194- गुड़ खाते हुए देखना- अच्छा समय आने के संकेत
195- शेर दिखाई देना- शत्रुओं पर विजय
196- हाथी दिखाई देना- ऐेश्वर्य की प्राप्ति
197- कन्या को घर में आते देखना- मां लक्ष्मी की कृपा मिलना
198- सफेद बिल्ली देखना- धन की हानि
199- दूध देती भैंस देखना- उत्तम अन्न लाभ के योग
200- चोंच वाला पक्षी देखना- व्यवसाय में लाभ
201- अंगूठी पहनना- सुंदर स्त्री प्राप्त करना
202- आकाश में उडऩा- लंबी यात्रा करना
203- आकाश से गिरना- संकट में फंसना
204- आम खाना- धन प्राप्त होना
205- अनार का रस पीना- प्रचुर धन प्राप्त होना
206- ऊँट को देखना- धन लाभ
207- ऊँट की सवारी- रोगग्रस्त होना
208- सूर्य देखना- खास व्यक्ति से मुलाकात
209- आकाश में बादल देखना- जल्दी तरक्की होना
210- घोड़े पर चढऩा- व्यापार में उन्नति होना
211- घोड़े से गिरना- व्यापार में हानि होना
212- आंधी-तूफान देखना- यात्रा में कष्ट होना
213- दर्पण में चेहरा देखना- किसी स्त्री से प्रेम बढऩा
214- ऊँचाई से गिरना- परेशानी आना
215- बगीचा देखना- खुश होना
216- बारिश होते देखना- घर में अनाज की कमी
217- सिर के कटे बाल देखना- कर्ज से छुटकारा
218- बर्फ देखना- मौसमी बीमारी होना
219- बांसुरी बजाना- परेशान होना
220- स्वयं को बीमार देखना- जीवन में कष्ट
221- बाल बिखरे हुए देखना- धन की हानि
222- सुअर देखना- शत्रुता और स्वास्थ्य संबंधी समस्या
223- बिस्तर देखना- धनलाभ और दीर्घायु होना
224- बुलबुल देखना- विद्वान व्यक्ति से मुलाकात
225- भैंस देखना- किसी मुसीबत में फंसना
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा

226- बादाम खाना- धन की प्राप्ति
227- अंडे खाना- पुत्र प्राप्ति
228- स्वयं के सफेद बाल देखना- आयु बढ़ेगी
229- बिच्छू देखना- प्रतिष्ठा प्राप्त होगी
230- पहाड़ पर चढऩा- उन्नति मिलेगी
231- फूल देखना- प्रेमी से मिलन
232- शरीर पर गंदगी लगाना- धन प्राप्ति के योग
233- पिंजरा देखना- कैद होने के योग
234- पुल पर चलना- समाज हित में कार्य करना
235- प्यास लगना- लोभ बढऩा
236- पान खाना- सुंदर स्त्री की प्राप्ति
237- पानी में डूबना- अच्छा कार्य करना
238- तलवार देखना- शत्रु पर विजय
239- हरी सब्जी देखना- प्रसन्न होना
240- तेल पीना- किसी भयंकर रोग की आशंका
241- तिल खाना- दोष लगना
242- तोप देखना- शत्रु नष्ट होना
243- तीर चलाना- इच्छा पूर्ण होना
244- तीतर देखना- सम्मान में वृद्धि
245- स्वयं को हंसते हुए देखना- किसी से विवाद होना
246- स्वयं को रोते हुए देखना- प्रसन्नता प्राप्त होना
247- तरबूज खाते हुए देखना- किसी से दुश्मनी होगी
248- तालाब में नहाना- शत्रु से हानि
249- जहाज देखना- दूर की यात्रा होगी
250- झंडा देखना- धर्म में आस्था बढ़ेगी
251- धनवान व्यक्ति देखना- धन प्राप्ति के योग!!!!!
भवसागर पार करने का एकमात्र रास्ता...#धर्ममार्ग.. #राजेश #मिश्रा

08 दिसंबर 2016

जग दीवाना कृष्ण का और कृष्ण दीवाने राधा के


हालांकि कृष्ण और राधा ने बचपन के कुछ ही साल साथ-साथ गुजारे, फिर भी आज हजारों साल बाद भी हम उन दोनों को अलग-अलग करके नहीं देख पाते। ऐसा कौन सा जादू था उस रिश्ते में?

जब कृष्ण ने गोपियों के कपड़े चुराए तो यशोदा माँ ने उन्हें बहुत मारा और फिर ओखली से बांध दिया। कृष्ण भी कम न थे। मौका मिलते ही उन्होंने ओखली को खींचा और उखाड़ लिया और फौरन जंगल की ओर निकल पड़े, क्योंकि वहीं तो उनकी गायें और सभी सथी संगी थे।

अचानक जंगल में उन्हें दो महिलाओं की आवाजें सुनाईं दीं। कृष्ण ने देखा वे दो बालिकाएं थीं, जिनमें से छोटी वाली तो उनकी सखी ललिता थी और दूसरी जो उससे थोड़ी बड़ी थी, उसे वह नहीं जानते थे, लेकिन लगभग 12 साल की इस लड़की की ओर वह स्वयं ही खिंचते चले गए।

दोनों लड़कियों ने उनसे पूछा कि क्या हुआ? तुम्हें इस तरह किसने बांध दिया? यह तो बड़ी क्रूरता है! किसने किया यह सब? उन दोनों में जो 12 वर्षीय लड़की थी, उसका नाम राधे था। जिस पल राधे ने सात साल के कृष्ण को देखा, उसके बाद वे कभी उनकी आँखों से ओझल नहीं हुए। जीवन भर कृष्ण राधे की आँखों में रहे, चाहे वह शारीरिक तौर पर उनके साथ हों या न हों। हालांकि बचपन के कुछ ही साल उन दोनों ने साथ-साथ गुजारे थे, फिर भी आज हजारों साल बाद भी हम राधा और कृष्ण को अलग-अलग करके नहीं देख पाते।
राधा

16 साल की उम्र के बाद कृष्ण पूरे जीवन राधा से कभी नहीं मिले। लेकिन सात साल की उम्र से लेकर 16 साल तक के उन नौ सालों में, जो उन्होंने राधे के साथ गुजारे, राधे उनका एक हिस्सा बन गईं। वह जीवन में बहुत सारे लोगों से मिले, बहुत सारे काम किए। उन्होंने कई विवाह भी किए, लेकिन राधे उनके जीवन में हमेशा बनी रहीं। राधा के शब्दों में, “मैं उनमें रहती हूं और वह मुझमें। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह कहां हैं और किसके साथ रहते हैं। वह हमेशा मेरे साथ हैं। कहीं और वह रह ही नहीं सकते।“ यानी जिस पल उन दोनों ने एक दूसरे को देखा था, उसके बाद से उन्हें एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा गया। आज करीब तीन हजार साल बाद भी आप उन्हें अलग करके नहीं देख सकते। कुछ आचारी धार्मिक लोगों ने इतिहास में कुछ जगहों पर इन दोनों को अलग करने की कोशिश की। उन्होंने राधे को अलग करने की कोशिश की, क्योंकि राधे महाभारत की बदचलन लड़की है। वह सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठती। इसलिए वे राधे को कृष्ण से अलग करके कृष्ण को ज्यादा ईश्वरीय स्वरूप में प्रस्तुत करना चाहते थे। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे राधा को कृष्ण के जीवन से बाहर नहीं कर सके।



खैर, राधे ने कृष्ण को लकड़ी की ओखली से खोलने की कोशिश की। मगर कृष्ण उन्हें रोक दिया और कहा, ‘इसे मत खोलो। मैं चाहता हूं कि इसे मां ही खोले, जिससे उनका गुस्सा निकल सके।’ इन लड़कियों ने पूछा, ‘क्या हम तुम्हारे लिए कुछ और कर सकते हैं?’ इस पर कृष्ण ने अपनी सखी ललिता से कहा, ‘मुझे पानी चाहिए। मेरे लिए पानी ले आओ।’ दरअसल, पानी के बहाने वह उसे वहां से हटाना चाहते थे। ललिता पानी लेने चली गई और सात साल के कृष्ण और 12 साल की राधा साथ-साथ बैठ गए। इस एक मुलाकात में ही ये दोनों एक दूसरे में विलीन होकर एक हो गए और फिर उसके बाद से उन्हें कोई अलग न कर सका।
कृष्ण जब 16 साल के हुए, जिंदगी ने उनके रास्ते बदल दिए। कृष्ण को अपनी बांसुरी पर बड़ा गर्व था। उनकी बांसुरी थी ही इतनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली। लेकिन 16 साल की उम्र में जब वह शारीरिक तौर से राधे से अलग हुए, तो उन्होंने न सिर्फ अपनी बांसुरी राधे को दे दी, बल्कि उसके बाद जीवन में फिर कभी उन्होंने बांसुरी नहीं बजाई।

राधा कृष्ण की पहली मुलाकात और इनका प्रेम

भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा की दूसरी मुलाकात लौकिक न होकर अलौकिक थी। इस संदर्भ में गर्ग संहिता में एक कथा मिलती है। यह उस समय की बात है जब भगवान श्री कृष्ण नन्हे बालक थे। उन दिनों एक बार एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे।

देवी राधा को पुराणों में श्री कृष्ण की शश्वत जीवनसंगिनी बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि राधा और कृष्ण का प्रेम इस लोक का नहीं बल्कि पारलौक है। सृष्टि के आरंभ से और सृष्टि के अंत होने के बाद भी दोनों नित्य गोलोक में वास करते हैं।
लेकिन लौकिक जगत में श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम मानवी रुप में था और इस रुप में इनके मिलन और प्रेम की शुरुआत की बड़ी ही रोचक कथा है। एक कथा के अनुसार देवी राधा और श्री कृष्ण की पहली मुलाकात उस समय हुई थी जब देवी राधा ग्यारह माह की थी और भगवान श्री कृष्ण सिर्फ एक दिन के थे। मौका था श्री कृष्ण का जन्मोत्सव।
मान्यता है कि देवी राधा भगवान श्री कृष्ण से ग्यारह माह बड़े थी और कृष्ण के जन्मोत्सव पर अपनी माता कीर्ति के साथ नंदगांव आई थी यहां श्री कृष्ण पालने में झूल रहे थे और राधा माता की गोद में थी।

इस तरह दूसरी बार मिले थे भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा

radha krishna first meeting and love story2 
भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा की दूसरी मुलाकात लौकिक न होकर अलौकिक थी। इस संदर्भ में गर्ग संहिता में एक कथा मिलती है। यह उस समय की बात है जब भगवान श्री कृष्ण नन्हे बालक थे। उन दिनों एक बार एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे।
उसे समय आचानक एक ज्योति प्रकट हुई जो देवी राधा के रुप में दृश्य हो गई। देवी राधा के दर्शन पाकर नंदराय जी आनंदित हो गए। राधा ने कहा कि श्री कृष्ण को उन्हें सौंप दें, नंदराय जी ने श्री कृष्ण को राधा जी की गोद में दे दिया।
श्री कृष्ण बाल रूप त्यागकर किशोर बन गए। तभी ब्रह्मा जी भी वहां उपस्थित हुए। ब्रह्मा जी ने कृष्ण का विवाह राधा से करवा दिया। कुछ समय तक कृष्ण राधा के संग इसी वन में रहे। फिर देवी राधा ने कृष्ण को उनके बाल रूप में नंदराय जी को सौंप दिया।

तीसरी मुलाकत में हुआ लौकिक प्रेम

radha krishna first meeting and love story3 
राधा कृष्ण की लौकिक मुलाकात और प्रेम की शुरुआत संकेत नामक स्थान से माना जाता है। नंद गांव से चार मील की दूरी पर बसा है बरसाना गांव। बरसाना को राधा जी की जन्मस्थली माना जाता है। नंदगांव और बरसाना के बीच में एक गांव है जो ‘संकेत’ कहलाता है।
इस स्थान के विषय में मान्यता है कि यहीं पर पहली पर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी का लौकिक मिलन हुआ था। हर साल राधाष्टमी यानी भाद्र शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक यहां मेला लगता है और राधा कृष्ण के प्रेम को याद कर भक्तगण आनंदित होते हैं।
इस स्थान का नाम संकेत क्यों हुआ इस विषय में कथा है जब श्री कृष्ण और राधा के पृथ्वी पर प्रकट होने का समय आया तब एक स्थान निश्चित हुआ जहां दोनों का मिलना तय हुआ। मिलन का स्थान संकेतिक था इसलिए यह संकेत कहलाया।

07 सितंबर 2016

विवाह के सात वचन

दो जीवन के एक होने के सात वादे
Saat Phero Ke Saato Vachan in Hindi

विवाह के साथ एक नए जीवन का आरम्भ होता है, हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों में विवाह को भी स्थान दिया गया है. और इनमें से हर संस्कार आज भी प्रासंगिक है. हिन्दू विवाह पद्धति में सात फेरे और सात वचन होते हैं. अगर इन सातों वचनों को जीवन भर निभाया जाए, तो वैवाहिक जीवन हमेशा सुखमय रहेगा. दूल्हा और दुल्हन विवाह के समय एक-दूसरे से सात वचन लेते हैं. ज्यादातर लोगों ने सात फेरों के बारे में सुना तो है, लेकिन इन सात फेरों को कम हीं लोग जानते हैं. तो आइए जानते हैं वो सात वचन कौन-कौन से हैं.

हिन्दू विवाह के सात वचन :

1. तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी

– कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थ यात्रा में जाएँ, या कोई व्रत इत्यादि करें अथवा कोई भी धार्मिक कार्य करें तो मुझे अपने बाएँ भाग में जरुर स्थान दें. यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.


2. पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम

– दूसरे वचन में कन्या वर से वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें और परिवार की मर्यादा के अनुसार, धार्मिक अनुष्ठान करते हुए भगवान के भक्त बने रहें, यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
3. जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात
वामांगंयामितदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं

– तीसरे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं: युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में मेरा पालन करने का वचन देते हैं. तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
4. कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:

– चौथे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप परिवार का पालन-पोषण करने और परिवार के प्रति अपने सारे दायित्वों का पालन करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
5. स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्‍त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या

– पांचवें वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप अपने घर के कामों में, लेन-देन में या किसी दूसरे काम के लिए खर्च करते समय मेरी भी सलाह लेने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
6. न मेपमानमं सविधे सखीना द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम

– छठे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों या अन्य स्‍त्रियों के बीच बैठी रहूँ, तो आप वहाँ सबके सामने मेरा अपमान नहीं करेंगे. आप जुआ या किसी भी प्रकार की बुरी आदतों से खुद को दूर रखेंगे. यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
7. परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमंत्र कन्या

– सातवें वचन में कन्या वर से कहती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के प्रेम के बीच में किसी और को नहीं आने देंगे. यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    8 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook